Friday, 30 November 2018

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ध्यान का आविष्कार बौद्ध सभ्यता ने किया है।
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ब्रम्हणधर्म पुराना होने के सबूत ब्राम्हणों की लिखी हुई किताबो में मिलते है, लेकिन वास्तव में कही नही मिलते।
बौद्ध धर्म पुराना होने के साबूत किताबो में नही मिलते लेकिन शिलालेखों एवं पुरातत्व विज्ञान में मिलते है।
ऐसा इसलिए भी हो सकता कि क्योंकि आर्यो ने मूलनिवासियो से शिक्षा का अधिकार छीन लिया। और हजारो मौलिक अधिकार छीनकर बौद्धिक-शैक्षणिक-सामाजिक दृष्टि से नपुंसक बना दिया।
ब्राम्हणों ने खुद को ब्रम्हपुत्र बता कर विद्या पर एकाधिकार कर किया।
परिणामस्वरूप इतिहास लिखने का हक सिर्फ उन्हें मिला।
उन्होंने बौद्ध इतिहास को विकृत कर दिया।
बौद्ध इतिहास का ब्राम्हणिकरन कर दिया और उसमें बौद्ध नायको को असुर,राक्षस,दानव आदि नाम दिए। 'चपड़' जैसे विद्वानों का ब्राम्हणीकरण कर चाणक्य बनादिया। ब्राम्हणों के ग्रंथो में अशोक(असोक) को असुर कहने का भी उल्लेख है।

ज्ञात सबूतों के आधार पर कहा जाएगा कि सम्राट अशोक के दरबार का सबसे बड़ा लेखक चपड़ था।

 ब्रह्मगिरी और जटिंग- रामेश्वर जैसे शिलालेखों को लिखने का श्रेय लेखक चपड़ को ही प्राप्त है।

बाकायदे अभिलेखों के नीचे लेखक चपड़ का नाम दर्ज है।

आश्चर्य कि लेखक चपड़ का नाम किसी किताब में दर्ज नहीं है।

इतिहासकारों ने मौर्यकालीन लेखकों में चाणक्य की गणना गाजे- बाजे के साथ किया है, मगर चपड़ को छोड़ दिया है।

मौर्यकाल का जो ऐतिहासिक लेखक है, वह गायब है, जो अनैतिहासिक है, वहीं सिर चढ़कर बोल रहा है।

 जिस  चाणक्य का इतिहास नहीं मिलता ऐतिहासिक सुबूत नहीं मिलते उसे स्कूल के सिलेबस में  पढ़ाया जाता है

 और जिस मौर्यकालीन चपड़ का  इतिहास मिलता है और जिसके इतिहासिक सबूत मौजूद है वह स्कूल के सिलेबस मे  इतिहास के पन्नों से ही लापता है

मौर्यकालीन ब्रह्मगिरि के शिलालेख का उदहारण देते हुए प्रो राजेंद्र प्रसाद सिंह कहते है "ज्ञात सबूतों के आधार पर कहा जाएगा कि सम्राट अशोक के दरबार का सबसे बड़ा लेखक चपड़ था।

 इसका मतलब ये हुआ कि कहीं ब्राह्मणों ने अपने फायदे के लिए चपड़ जैसे विद्वान को ही चाणक्य तो नहीं बना दिया है,

क्योंकि आज भी हमारे गावों में जब कोई बीच-बीच में अधिक बोलने लगता है तो लोग कहते है कि "ज्यादा चपड़-चपड़ ना करों"।

 इस कहावत का मतलब है कि "अपने ज्ञान का ज्यादा प्रदर्शन ना करों"।

 इस कहावत में चपड़-चपड़ ज्ञान व विद्वाता का परिचायक है।

इससे स्पष्ट है कि कहावत ये जो "चपड़-चपड़" है इसका स्रोत कोई और नहीं बल्कि सम्राट अशोक के दरबार में विद्यमान रहें विद्वान चपड़ ही है।

चंद्रगुप्त मौर्य के साथ उनके तथाकथित गुरु चाणक्य का नाम जोड़ना भी बुद्धिज़्म पर आधारित भारत की प्राचीनतम जीवन-शैली के अपहरण करने की साजिश का ही हिस्सा था।

ये सब विदेशी ब्राह्मणों द्वारा किया गया षड्यंत्रकारी ब्राह्मणी कृत्य है। बौद्ध भारत के ब्राह्मणीकरण करने की एक कामयाब लेकिन ओछी हरकत है।
ऊपर की तस्वीर (शिलालेख) में आप चपड़ के विचार देख सकते है।

अशोक महान का असली नाम असोक है। ईसा पूर्व संस्कृत भाषा का अस्तित्व नही था। ये भाषा मौर्यवंश के अस्त के बाद निर्मित हुई है। ईसा पूर्व का कोई भी शिलालेख संस्कृत भाषा मे नही है।

पुष्यमित्र शुंग द्वारा छल कपट से बौद्ध साम्राज्य का विनाश हुआ। नालन्दा, तक्षशिला जैसे दस महाविद्यालयों को ध्वस्त कर दिया।  फिर बौद्ध धर्म की शिक्षा/ज्ञान का ब्रम्हणिकरन कर दिया गया, जिस से ब्रम्हणधर्म का निर्माण हुआ। बृहदस्त की हत्या से पूर्व ब्रम्हणधर्म का अस्तित्व ही नही था।

जिस प्रकार संतों का सम्मेलन/ बैठक/ मिटिंग होती हैं - इसी तरह की शुन्गकाल में हुई थी जिसमें ब्राह्मण धर्म स्थापित करने के लिए ब्राह्मणों का विचार मंथन हुआ था - यही इनका समुद्र मंथन था जिसमें भविष्य के नकली/अवतारी/वैदिक इतिहास रचने का पूरा खाका तैयार किया गया था - सारी जीचें बोद्धों से चुराने का षड्यंत्र था - धन्वन्तरी का चिकित्सा विज्ञान हो या महामाया को लक्ष्मी बनाकर बुद्ध को विष्णु के अवतार में बदलना और लक्ष्मी को उसके पैरों में बैठा देना - और ये सब हुआ मौर्य वंश के पतन के बाद

जहा जहा बुद्ध जाते थे वहां के राजा उनके लिए अपनी हैसियत के हिसाब से विहार बनवाते थे। यही प्रथा सीखो के धर्मगुरुओ के साथ भी होती थी, जहा जहा सीखो के धर्मगुरु जाते थे, उनके लिए गुरुद्वारा बनता था।

बुद्ध से पूर्व मन्दिर नाम का शब्द ही नही था, ओर नाही ऐसी कोई संस्कृति थी। शुंग ने जब बौद्ध भिक्षुओं की सामूहिक हत्याए की, भयंकर नरसंहार किया। तब ये विहार उजड़ गए...

इन उजड़े हुए विहारों में उसने अपने पूर्वजों की मुर्तिया स्थापित की ओर उनको चमत्कारी होने का प्रचार शुरू करवा दिया।
कुछ जगह बुद्ध की मूर्ति में ही थोड़े बदलाव कर दिए...
जैसे कि बालाजी, पंढरपुर का पांडुरंग आदि

फिर बौद्ध नागरिकों को जबरदस्ती शुद्र बना दिया, आज जो sc,st,obc, minorities है। वो पहले बौद्ध थे..
जब ये उन मन्दिरो में प्रवेश करते तब पहचान जाते थे कि ये तो बुद्ध है, इनके साथ ये कर्मकांड क्यू कर रहे हैं.??
इसलिए इनको मन्दिर में आने के लिए मना कर दिया, ताकि ये लोग विद्रोह ना करे। आज तक ब्राम्हण ये प्रथा निभा रहे है।
पहली पीढ़ी का ढोंग दूसरे पीढ़ी का पाखण्ड बनती है, तीसरे पीढ़ी की परंपरा और चौथे पीढ़ी का धर्म...
मूलनिवासियो से शिक्षा जैसे मौलिक अधिकार छीन लिए गए, इसलिए कोई कुछ समझ ही नही पाया।

कानपुर में ... मेरठ में ... अनेक जगहों पर ... इसी अक्टूबर महीने में हजारों - हजार लोगों ने बौद्ध धर्म अपनाया।

सवाल यह नहीं है कि हजारों - हजार लोगों ने बौद्ध धर्म अपनाया बल्कि इतिहास से सवाल यह है कि इन्होंने बौद्ध धर्म छोड़ा कब था?

या कि काल्पनिक रूप से मान लिया गया कि ये हजारों - हजार लोग बौद्धेतर धर्म के हैं।

इतिहास तो ऐसी गवाही नहीं देता है कि कभी हजारों - हजार लोगों ने सामूहिक रूप से बौद्ध धर्म छोड़ा था।
कानपुर में ... मेरठ में ... अनेक जगहों पर ... इसी अक्टूबर महीने में हजारों - हजार लोगों ने बौद्ध धर्म अपनाया।

सवाल यह नहीं है कि हजारों - हजार लोगों ने बौद्ध धर्म अपनाया बल्कि इतिहास से सवाल यह है कि इन्होंने बौद्ध धर्म छोड़ा कब था?

या कि काल्पनिक रूप से मान लिया गया कि ये हजारों - हजार लोग बौद्धेतर धर्म के हैं।

इतिहास तो ऐसी गवाही नहीं देता है कि कभी हजारों - हजार लोगों ने सामूहिक रूप से बौद्ध धर्म छोड़ा था।

खैर अब मुद्दे पर आते है...

ध्यान का आविष्कार बुद्ध ने किया था।
इसलिए बुद्ध की प्रतिमा को हमेशा ध्यानस्थ रूप में दिखाया जाता है।

गौतम बुद्ध ने " ध्यान " को विश्वव्यापी बनाया।

पालि में यह " झान " है। ब्राम्हणों ने " झान " का ब्रम्हणिकरन कर " ध्यान " बनाया। ओर उसमे बदलाव कर के परिष्कृत किया।

बुद्ध का यह " झान " जब चीन पहुँचा, तब वहाँ चियान/ चान हुआ।

बुद्ध का यह " झान " जब कोरिया पहुँचा, तब वहाँ सिओन/ साॅनजान हुआ।

बुद्ध का यह " झान " जब वियतनाम पहुँचा, तब वहाँ थियेन हुआ।

बुद्ध का यह " झान " जब जापान पहुँचा, तब वहाँ जेन हुआ।

महावीर को बुद्ध का समकालीन बताया जाता है।
लेकिन त्रिपिटक, धम्मपद जैसे प्राचीन ग्रन्थों में महावीर का कोई उल्लेख नही मिलता। जब कि बुद्ध हर विषय ओर हर प्रभावशाली व्यक्तित्व पर बोल गए जो उस समय मे उपस्थित थे।
लेकिन जेन ग्रंथो में बुद्ध का न केवल उल्लेख मिलता है बल्कि निंदा भी मिलती है। इस से ये साबित होता है कि महावीर बुद्धकाल के अस्त के बाद ब्राम्हणयुग में पैदा हुए।
शुभम बलांडे (भारत मुक्ति मोर्चा)